Lessons from Germany for India and the Symbolism of Violent Detention

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Pinjra Tod activists protest against CAA-NRC

Police violence in Delhi is both a fearmongering campaign strategy and an assertion of the BJP’s fascist authority

Noumaan Anwer | Caravan Daily

On 1st February, a small group of determined protesters led by student activists from independent women’s collective, Pinjra Tod, arrived outside the central-Delhi BJP headquarters, to raise their deep discontentment against party’s recent political masquerades. The use of communally inflammatory rhetoric in BJP leaders’ Delhi election campaign speeches has deepened existing feelings of anger among those who have been critical of the Hindutva nationalist project for the longest time. Ire against the NPR, NRC, and CAA has been exacerbated by the firing of a bullet by at a student from Jamia Millia Islamia, leaving activists in shock.

The demonstration by the 25-strong group begun at four in the afternoon. The unfurling of a banner proclaiming the demise of Hindu Rashtra at the hands of women instantly drew the Delhi police’s attention. Despite a determined effort to register their demands peacefully, the protest was violently dissipated by police constables – a clear indication of the BJP’s rising conditional and systemic repression. All participants were detained aggressively, and released later at Rajendra Nagar Police Station.

LIVE FROM PINJRA TOD PROTEST OUTSIDE BJP HEADQUARTERS IN NEW DELHI: महिला सुरक्षा नाम पर कौमी नफ़रत फैलाना नही चलेगा!नागरिकता क़ानून और रेजिस्टर के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के धार्मिक ध्रूवीकरण के खिलाफ आओ आवाज़ उठायें !!कल दोपहर 3 बजे भाजपा कार्यालय (दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, बाराखंबा रोड) के सामने विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।हम बीजेपी सांसद परवेश वर्मा द्वारा की गई हालिया टिप्पणियों की निंदा करते हैं जिन्होंने शाहीन बाग के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को 'बलात्कारी और हत्यारा' बताया है। "घरों में घुस कर", "बहनों और बेटियों का बलात्कार" की बयानबाजी हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा की गंभीर समस्या का एक शर्मनाक चुनावी उपयोग है। प्रदर्शनकारियों पर हमला उकसाते हुए भाषणों, पुलिस द्वारा बल प्रयोग की धमकी, व जान बूझ कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माध्यम से ऐसी बयानबाजी वास्तव में महिलाओं की असुरक्षा को और बढ़ाने का काम करती हैं।यह प्रमाणित तथ्य है कि वास्तव में यौन दुर्व्यवहार के अधिकांश मामले परिचित लोगों से होते हैं। तानाशाही हुकूमत में सत्ता के दुरुपयोग के अवसर ज़्यादा है। ऐसे में सत्ता में ताकतवर लोगों को महिलाओं के साथ अपराध करने के और भी मौके मिलते हैं। कुलदीप सेंगर और स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ हाल में उठे मामले, और शिकायतकर्ताओं और उनके परिवारों पर हुए हमले इसी तथ्य को दर्शाते हैं। परवेश वर्मा ने कहा है कि जारी विरोध दिल्ली को कश्मीर में बदल देगा, और इसे महिलाओं के लिए असुरक्षित बना देगा। हालाँकि, हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि कश्मीरी महिलाओं पर सबसे बड़ा और सबसे क्रूर हमला सेना द्वारा किया गया है। कुनान पोषपोरा में सीआरपीएफ और बीएसएफ सैनिकों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार को याद कर आज हमारे रूह कांप उठते हैं।इस सरकार ने पहले भी यौन हिंसा के मुद्दे को अपने चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया है। नहीं तो ऐसा क्यों कि 16 दिसंबर की घटना के सात साल बाद, और दिल्ली चुनाव से 7 दिन पहले ही ये निर्भया कांड के अपराधियों की फांसी के तमाशे को हवा दे रहे हैं। यह सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करना चाहती है लेकिन खाली पड़े न्यायिक पदों को नहीं भरना चाहती, यह 'बेटी बचाओ, बेटी पढाओ' कहती है, लेकिन सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को बंद कर रही है, यह महिला सुरक्षा के बारे में बात करती है, फिर भी केवल उन्हें असहाय "बहनों और बेटियों" के रूप में स्वीकारना चाहती है ताकि अपने फायदे के लिए उनकी इज्ज़त का तकाज़ा कर के "भाइयों और पिताओं" के खून में आग लगा सके।वास्तव में शाहीन बाग़ में प्रदर्शनकारियों और महिलाओं की सुरक्षा के बीच इस अजब संबंध की कुंजी आरएसएस के एक प्रमुख ग्रंथ में मिलती है, जिसमें लिखा है, "मत भूलो … उस अत्याचार को जो सुल्तानों और मुस्लिम मंत्रियों और अन्य हजारों, बड़े और छोटे लोगों ने हमारे साथ किया है… एक प्रतिज्ञा लेते हैं कि एक हिंदू जीत की स्थिति में मुस्लिम महिलाओं से हमारे उत्पीड़न और घृणास्पद हाल का बदला लिया जाएगा।" खयाल रहे कि अपील की आवाज़ आपको यह सोचने में भ्रमित न कर दे कि यह अल्फ़ाज़ किसी भी समुदाय की महिलाओं द्वारा कहे, या लिखे गए हैं। वास्तव में ये शब्द आरएसएस के संस्थापक वीर सावरकर द्वारा जानबूझकर अपने कैडरों को बलात्कार और हत्या के लिए उकसाने के लिए हिंदू महिलाओं की काल्पनिक आवाज में कहे जाते हैं। भाजपा सांसद परवेश वर्मा ने ज़रूर ही स्वयं परम गुरु से ही अपने पाठ पढ़े हैं।भाजपा महिलाओं की वास्तविक आवाज़ को दबा कर अपने निहित राजनीतिक लाभ के लिए उनके मुंह में शब्द डालने की कला में माहिर है। आज, महिलाएं, मुस्लिम महिलाएं और साथ ही विभिन्न विश्वविद्यालयों और समुदायों की छात्राएं, पूरे देश में सीएए एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे निकल आयी हैं और इस प्रतिरोध की दिशा को ढालने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। फिर भी, योगी आदित्यनाथ ने महिला प्रदर्शनकारियों पर विपक्षी दलों के लिए सीएए के खिलाफ उनके एजेंडे पर महज प्रचार करने का आरोप लगाया है।कल जामिया में प्रदर्शनकारियों पर 'ये लो आजादी' चिल्लाते हुई बंदूक से गोली चलाने वाले एक शख्स ने शादाब फारूक को घायल कर दिया। दिल्ली पुलिस शूटर को रोकने और शादाब को सहायता प्रदान करने में पूरी तरह विफल रही। यह बीजेपी द्वारा प्रचारित और मीडिया द्वारा समर्थित भय और घृणा के खतरे का प्रमाण है। कि कैसे "देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को" जैसे नारे नफरत को उकसाने में वास्तविक प्रभाव डाल रहे हैं। इन घृणा फैलाने वाले मंत्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए भारत के चुनाव आयोग के इनकार से लोकतांत्रिक संस्थानों की दुर्गति समझ आती है।इस देश की महिलाएँ फातिमा शेख, सावित्रीबाई फुले और प्रीतिलता वाडेडकर के संघर्षों की विरासत हैं। महिलाओं ने अपने अधिकारों को बड़ी कुर्बानियां दे कर जीता है, और देश भर में जान दाव पर लगा कर इनकी रक्षा कर रही हैं। आइए सावरकर और उनके शिष्यों के ढकोसलों का अंत करें और सड़कों पर उतर कर भाजपा की एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों को विभाजित करने के सांप्रदायिक प्रयासों को विफल करने के लिए आगे आएं। इंकलाब जिंदाबाद! #pinjratod

Posted by Pinjra Tod: Break the Hostel Locks on Saturday, February 1, 2020

The brutal detention of the protesters involved physical and verbal abuse, and represents the vehemence with which the BJP is pushing to win the Delhi election – the communal attack and recent clampdown on protests sites such as Shaheen Bagh and Jamia is the core of its ‘law and order’ campaign strategy.

Last week, Minister of State for Finance Anurag Thakur was banned from campaigning for 72 hours after he encouraged attendees of a BJP campaign rally to chant “desh ke gaddaron ko, goli maaron saalon ko.” West Delhi BJP MP went a step further, telling ANI news that people “there” (at protests sites like Shaheen Bagh) would “enter your homes and rape your sisters and daughters”. He too was slapped with a campaign ban by the EC. But it was serial offender Union Minister Amit Shah who couched this narrative in the explicit political rhetoric of the election, asking voters to either side with the BJP or the protesters.

These statements by the party’s top brass represent their growing frustrations at the inability to dissipate protests which have now gone on for a month and a half. The BJP leadership clearly did not expect such widespread opposition to the openly-discriminatory CAA when it passed, and their attempts to clamp down on enclaves of resistance have failed miserably. Therefore, as the 8th February Delhi election draws closer, fear-mongering through political speeches, and all other means possible has been ramped up.

The firings at Jamia on 30th January, and at Shaheen Bagh on 1st  February are part of the same tactic – to convince voters that ‘normalcy’ and order cannot be restored if they back the protests. According to Shah’s binary, the only alternative is to vote for the BJP. Meanwhile, the Delhi Police that answers to the Home Minister’s Office steps up its aggression against protesters. This, in and of itself, is an explicitly authoritarian strategy.

But the untethered violence used by the police in dealing with the protest outside the party headquarters on 1st Feb, represents a deeper symbolic assertion of authority. The area around the headquarters is perennially swarming with law enforcement personnel of variant grades – from the Delhi Police to the CISF, never more certainly than when political and social fury against the party is raging across the country and the capital.

Incidence of violence is not new to activists in the capital – indeed, for many it has become normal in the past month. Protests outside other public structures in ‘stable’ areas have drawn similarly brutal clampdowns. Such treatment was meted out to demonstrators at UP Bhawan on 23 December, and at JNU MHRD on 9 January. Therefore, the police’s use of violence against the protesters – which involved verbal provocation, flying fists, torn clothing, and aggressive manhandling – suggests a sinister meaning, characteristic of fascist nationalists through history.

At the turn of the new year in 1931, a 19th Century neo-classical aristocratic mansion in Munich was reopened to ominous ceremonialism. Extensively reconstructed by architect Paul Ludwig Troost under the Fuhrer’s supervision, the Nazi Party’s new Headquarters, Brown House, became the center of an unbreachable administrative district of Hitler’s rising fascist regime. Early in the course of the Nazis’ ascendance to power, the administrative district of Königsplatz was occupied and transformed into a central cult venue and forum. A model public space of the party’s creation, it came to symbolize the brutal efficiency of Hitler’s regime.

The state of Bavaria was heavily militarised, and Munich as its capital the base from where the Nazi’s begun to spread their hysteria across Germany. The city’s police chief was the fearsome Karl von Eberstein. The culture of violent repression Eberstein inculcated in the Munich police contributed significantly to the enforcement of the Nazi’s activities. The police chief, also a senior party leader, was notorious for his role in Krisstalnacht – a Jewish Pogrom that took place in November 1938.

“The Night of Broken Glass” is known for the mass incarceration of Jews under official direction. Eberstein, in fact and the police were officially instructed not to interfere in the “anti-Jewish demonstrations”. Plain-clothes State Police abetted in the destruction of Jewish property across central Munich, allowing the Nazis to take control of it. This police regime emanated out of the Administrative District of the Party, where Brown House was located. The message was clear – the party would retain command of the city by any means possible.

A similar assertion is made by the BJP as it consolidates its very own enclave of authority. Questions about the presence of disproportionately large battalions of law enforcement personnel in these parts of the city can be answered using the logic the Nazis used as well. Where the BJP is, there will be order, even if threats of and actual violence is necessary. Whether in context of the election, or in general, if consolidation of power requires police aggression and assistance, then so be it.

The election strategy is an assertion of the same narrative – that important, non-politicized public spaces are not to be disturbed. ‘Normalcy’ exists everywhere but several inherently radicalized ‘anti-national’ enclaves, such as JNU, Jamia, and Muslim-majority neighbourhoods such as Shaheen Bagh and Seelampur. In the context of the upcoming election, the validity of that binary has become even more crucial to the party’s authority. As the effort to create division through fear-mongering burgeons, the voices of dissent shall only grow louder, even in the face of intemperate violence.

The violence of the Delhi Police in ‘protecting’ the BJP headquarters is therefore a product of the party’s insecurity about asserting itself effectively – through the defense of crucial symbolism. The challenges currently being posed to that assertion are clearly a festering thorn in the BJP’s corrupted flesh – one that they will use any and all means to uproot. Protests, however, will continue, unaffected by the police’s unabashed brutality. They shall continue armed with the knowledge that all of this is an attempt to create division and fear, for immediate political gain, and long-term consolidation, by India’s very own fascist regime.


Noumaan Anwer is a student at St Stephen’s College, University of Delhi. The views are personal and Caravan Daily does not necessarily share or subscribe to them.

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